धोनी जैसे सेनापति रिटायर नहीं होते, केवल रणक्षेत्र बदलते हैं.. अजय दुबे

धोनी जैसे सेनापति रिटायर नहीं होते, केवल रणक्षेत्र बदलते हैं..
अजय दुबे
‘माही’ के खेल से रिटायर होने का मुझ जैसे क्रिकेट के अल्पज्ञानी के लिए क्या मतलब है? जीत को आदत में बदलने के आग्रही सेनापति की रणक्षेत्र से स्वैच्छिक निवृत्ति या फिर उस लाजवाब हेलीकाॅप्टर शाॅट का स्मृति के हैंगर पर हमेशा के लिए टंग जाना ? एक लंबे बालों वाले मर्द क्रिकेटर का हर वक्त जूझने की मुद्रा में चौकस रहना या फिर विकेट के पीछे घात लगाए सजग विकेट कीपर का हमेशा के लिए ग्लव्स उतार देना? कोई निश्चित जवाब देना कठिन है। असल में धोनी के कई चेहरे हैं, जिन पर क्रिकेट की वीर गाथाएं लिखी हैं। लिहाजा उनका संन्यास भी चौंकाने वाला था। इसलिए नहीं कि वह अचानक भूकंप के झटके की तरह आया था, बल्कि इसलिए था कि ‘कैप्टन कूल’ क्रिकेट से अपनी विदाई का ऐलान भी ‘सुबह की ठंडी अोस’ की तरह करेंगे, यह उम्मीद किसी को नहीं थी। धोनी के क्रिकेट में उम्र कुछ दस्तक देने लगी थी, लेकिन वो अचानक और इस बेदर्दी के साथ अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से संन्यास ले लेंगे, यह झटका देने वाली बात थी। वरना लोग तो रिटायरमेंट उस घड़ी तक टालते रहते हैं, जब कि लोग उन्हें घर तक न छोड़ आएं।
बहरहाल रविवार सुबह 7 बजकर 29 मिनट पर एक मैसेज इंस्टाग्राम पर नमूदार हुआ- ‘कंसीडर मी रिटायर्ड फ्राॅम 17:29। इसके बाद तो मानो खेल प्रेमियों और महान क्रिकेटर महेन्द्र सिंह धोनी (माही) के प्रशंसकों के दिन का एजेंडा ही बदल गया। इस का महत्व इसी बात से समझा जा सकता है कि धोनी के रिटायरमेंट के कारणों की व्याख्याक देश के एक और महान‍ क्रिकेटर सुनील गावस्कर को करनी पड़ी। गावसकर ने कहा कि धोनी निश्चित तौर पर यह जानना चाह रहे थे कि आईपीएल में वो कैसा प्रदर्शन करते हैं। इसके बाद ही वो तय करते कि अगले टी-20 वर्ल्ड कप में खेलना है कि नहीं। चूंकि कोरोना वायरस के चलते आईपीएल पोस्टपोन हो गया और टी-20 वर्ल्ड कप भी दो साल तक के लिए टल गया तो धोनी को लगा होगा कि जब अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट ही नहीं है तो फिर हाथ में बल्ला थामे रखना भी बेमतलब है।
क्रिकेट एक ऐसा खेल है, जिसमें खिलाड़ी की उपलब्धियां आंकड़ों के स्क्रीन शाॅट पर नापी जाती हैं। इस लिहाज के धोनी के तरकश में कामयाबियों के इतने तीर हैं कि वो चाहे जब कह सकते हैं कि कौन सा तीर दिखाऊं? भारतीय क्रिकेट के वो सफलतम कप्तान तो रहे ही हैं, साथ में बेहतरीन विकेट कीपर और कुशल रणनीतिकार भी रहे हैं। शायद भाग्य और क्रिकेट की ललक ही उन्हें बचपन में फुटबाॅल के मैदान से क्रिकेट की पिच तक खींच लाई और जन्म कुंडली में इतिहास रचने की अघोषित भविष्यवाणी ही धोनी को रेलवे टीटीई की नौकरी छुड़वाकर भारतीय ‍क्रिकेट टीम के अब तक के सबसे सुनहरे दौर का टिकट कटवाने के लिए ले आई।
जिस कालखंड में सचिन तेंडुलकर को भारतीय क्रिकेट टीम की ‘स्थायी आस’ माना जाता था, उसी दौर में 2005 में लंबे बालों वाले एक मजबूत कद काठी वाले भारतीय क्रिकेटर ने पाकिस्तान दौरे के समय दुनिया का ध्यान खींचा। पता चला कि इस नए चेहरे का नाम महेन्द्रसिंह धोनी है। तब धोनी की चर्चा उनके क्रिकेट के साथ-साथ उनके गर्दन पर झूलते लंबे बालों के कारण भी होती थी। क्योंकि भारतीय क्रिकेट टीम में तब तक इस स्टाइल के बाल रखने वाला कोई क्रिकेटर सामने नहीं आया था। धोनी के उन बालों की तारीफ तब पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ ने भी की थी।
लेकिन जल्द ही हमने बालों से परे धोनी की उस क्रिकेट प्रतिभा का जलवा देखा, जिसने धोनी को धोनी बनाया। 2007 में हुए पहले टी-20 वर्ल्ड कप में धोनी की अगुवाईं में नौजवानों की टीम सीधे कप जीतकर ही लौटी। तब बस एक ही नारा गूंजता था ‘चक दे इंडिया।‘ हमे पहली बार अहसास हुआ कि ‘दे दनादन’ शैली में खेले जाने वाले क्रिकेट के इस फार्मेट के हम भी बादशाह हो सकते हैं। इस वर्ल्ड कप के फाइनल में धोनी की कमाल की रणनीति ने जीत को भारत के पाले में खींच लिया। इसके बाद ‘धोनी’ का भावार्थ ही जीत होने लगा। क्रिकेट को सिर्फ हार-जीत, चौके-छक्के और आउट-बोल्ड के शब्दकोश में पढ़ने वाले अक्सर कमेंट करते सुनाई पड़ते थे- अरे धोनी हैं न, वो निपटा देगा। कुछ इसी तरह की आश्वस्ति पहले सचिन तेंडुलकर के क्रीज पर डटे रहने को लेकर सुनाई देती थी। धोनी के दीवाने तो यह मानने लगे थे ‍कि धोनी के पास कोई जादू की छड़ी है,जो हर मैच में भारतीय टीम के पक्ष में जीत का मंतर फेर देगी। यह केवल खाम खयाली नहीं थी। रिकाॅर्ड खुद बोलते हैं। यानी 2007 में टी-20 विश्व कप भारत के खाते में लिखवाना, 2011 का वन-डे वर्ल्ड कप एक बार फिर भारत के नाम करना और 2013 में चैम्पियंस ट्राॅफी पर कब्जा कर लेना, सार्वकालिक महानता का शाॅर्ट मैसेज लिखने के लिए काफी है।
क्रिकेट एक कला भी है, जिसका पैमाना केवल जीत के गुलदस्ते हासिल करना नहीं है। धोनी को एक अत्यंत कठिन और अनोखे हैलीकाॅप्टर शाॅट के धुरंधर खिलाड़ी के रूप में भी जाना जाता है। हेलीकाॅप्टर के पंखे की मानिंद बैट घुमाकर लगाया जाने वाला यह शाॅट आंखों को दूरबीन की तरह आसमान तक ले जाकर जमीन पर बाउंड्री के पार तक ले जाता है। ऐसे शाॅट से दो ही क्लिक होते हैं-चौका या छक्का। क्रिकेट का सवाली और क्या चाहे? चौकों-छक्कों की बरसात हो और और विरोधी टीम के दनादन ध्वस्त होते विकेटों की दावत हो। यानी कलात्मक ‍क्रिकेट यहां एक ठोस विजुअल में बदलता है और परिणामों से ही उसकी सार्थकता तय होती है।
एक सामान्य क्रिकेट दर्शक होने के नाते अगर धोनी के क्रिकेट में योगदान का आकलन करूं तो धोनी बीते चार दशक में भारतीय क्रिकेट में असंभव को संभव बनाने की जीवंत कहानियों की नवीनतम कड़ी कहे जाएंगे। यह सिलसिला सत्तर के दशक के महान क्रिकेटर सुनील गावसकर से शुरू होता है। गावसकर ने जब 1987 में क्रिकेट से संन्यास लिया तो कहा गया कि अब शायद ही कोई टेस्ट क्रिकेट में 10 हजार रनों का हिमालय पार कर सके। 1994 में जब एक और सार्वकालिक महान क्रिकेटर कपिल देव ने क्रिकेट को अलविदा कहा तो माना गया कि भारत को वन-डे क्रिकेट कप जितवाना कपिल के ही बस की बात थी। क्योंकि टीम में वैसा दम भरने वाला क्रिकेटर शायद ही नसीब हो। 2012 में जब क्रिकेट के भगवान’ सचिन तेंडुलकर ने अपने बल्ले को हमेशा के लिए विश्राम दिया तो लोगों ने कहा कि ‘शतकों का शतक’ बनाने वाला अब कोई दूसरा न होगा। यह तो पराकाष्ठा है। ‘भगवान’ के बाद अब क्या?’ लेकिन सीमाएं ही नई मंजिलें तय करती हैं। उसी बीच उदय हुआ, उस ध्रुव तारे का जिसने भारतीय क्रिकेट टीम को न सिर्फ जीतने का चस्का लगाया बल्कि उसे आदत में बदल दिया। क्योंकि एक बार जीत जाना एक बात है और हर बार जीतने के लिए जान लगा देना, उसकी अगली कड़ी है। दबाव को दबाव में लाना धोनी ने सिखाया। यह तो कोई भी मानेगा कि धोनी ने अपने खेल, नेतृत्व क्षमता, रणनीतिक कौशल और जोखिम उठाने की काबिलियत से भारतीय क्रिकेट टीम में वो असर पैदा किया कि अर्से तक आम क्रिकेट प्रेमी मानने लगा था कि धोनी जीत की कुंडली खुद ही रचते हैं। कई भूषणों, सम्मानों से नवाजे गए धोनी ने अभी क्रिकेट के मैदान से ही ग्लव्स उतारे हैं। जीवन के अन्य क्षेत्रों में नई पारी खेलने का रोमांच तो अब शुरू हुआ है। आश्चर्य नहीं कि धोनी राजनीति के मैदान में हेलीकाॅप्टर शाॅट लगाते मिलें। दरअसल धोनी एक जन्मजात सेनापति हैं और सच्चा सेनापति केवल युद्ध के मैदान बदलता है। धोनी जाते हुए भी अपने युवा साथियों और भावी क्रिकेटरों के लिए यह चुनौती छोड़ कर जा रहे हैं कि उनकी खींची जीत की रेखाअोंको वो कितना आगे ले जा सकते हैं। यह चुनौती वास्तव में उनके ‘हेलीकाॅप्टर शाॅट’ को ‘मिसाइल शाॅट’ में तब्दील करने की है। धोनी की इस चुनौती को कौन, कब और कैसे स्वीकार करेगा, यह भविष्य बताएगा।

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